हॉं मैं जड़ हूं…

हॉं मैं जड़ हूं…
हॉं मैं जड़ हूं…चेतन को जन्म देने वाली, हॉं मैं जड़ हूं….समस्त भार उठाने वाली
मैं अवयक्ता मैं परिपक्ववता मैं अल्हड़ता मैं समत्वता, मैं जीवनदायनी मैं मुक्तिवाहनी मैं अचल मैं अटल
नाम की होड़ में मैं नहीं कहीं ,काम की दौड़ मे मैं हर कहीं
क्या मिला क्या खो दिया बही खाते मे मैं नहीं फंसी ,क्या खिला दिया क्या बो दिया इसी फिकर् मे मैं लगी रही
हर पल ढलती इस दुनिया के आडम्बर मे मैं क्यों फंसू ,अपनी देखूं अपनों की सोचूं कुछ ईश्वर पर भी यकिं करूं
भले तेरी नजरों मे कुछ नहीं सही, नन्ही सी जान की दुनिया बनी,
तृप्त हुई मैं ,महक गयी और खुद को भुला आकार दिया
निराकार ने इस पावन यज्ञ को मुझे चुना
तुम मानो या कि न मानो मैं जानूं मुझको सबसे बड़ा सम्मान दिया ।।

3 thoughts on “हॉं मैं जड़ हूं…”

Manas Das says:
 simply beautiful…
i was completely still for a moment reading this hindi poem…
an intense message… deep & thick
you write nicely vibha Jee!

Vibha says: 
Thank you manas da for your encouraging words…trying to impress my sister by typing in hindi……she writes poem in hindi.

Manas Das says:
 keep on writing….
beautiful articulation and imaging message
so brilliantly….
keep up……

नदी

नदी

मैं नदी जीवनदायनी
तप्त हुई,पर उड़ चली
रिमझिम बरसी हर तरफ
खिलखिलाती बह चली
बिखेरती धन धान्य हर तरफ
पर्वतों को चिरती चट्टानों से टकराती
अनवरत कोशिश करती,उमड़ चली
मजि़ल की ओर
जब कभी जकड़ी गयी
प्रचंड बन मैं लड़ पड़ी
विथ्वंस मैं भी दे गयी वरदान नहरों के समान
मिल गयी सागर में
अस्तित्व अपना भूला दिया
सबने कहा ये क्या किया ये क्या किया
मुझको पता है खो के भी
मैंने खुदी को पा लिया ।।